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सिर्फ ‘छुट्टी’ से समृद्ध नहीं होगी लोक विरासत : धामी

देहरादून। लोकपर्व इगास पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किए जाने के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्णय की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। लेकिन मुख्यमंत्री का मानना है कि त्यौहार के नाम पर सिर्फ छुट्टी कर देने से हमारी लोकसंस्कृति समृद्ध नहीं होगी बल्कि ऐसे पर्वों को जन सहभागिता से पूरे उत्साह के साथ मनाया जाना चाहिए।
दिवाली के 11वें दिन एकादशी को उत्तराखंड में इगास यानी बूढ़ी दिवाली मनाने का रिवाज सदियों पुराना है। गढ़वाल में इगास को बग्वाल के रूप में मनाया जाता है। जबकि कुमाऊं में इसे बूढ़ी दीपावली कहा जाता है। इस पर्व के दिन सुबह मीठे पकवान बनाए जाते हैं। रात में स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा अर्चना के बाद भैलो जलाकर उसे घुमाया जाता है और ढोल दमाऊ के साथ आग के चारों ओर लोक नृत्य किया जाता है। लेकिन गांवों से बड़े पैमाने पर हुए पलायन और अन्य कारणों से इस पर्व की चमक धीमी पड़ती जा रही है। अब धामी सरकार चाहती है कि इन तीज त्यौहारों को फिर से बड़े पैमाने पर मानाया जाए ताकि इन लोक परम्पराओं के संवर्धन में नई पीढ़ी भी दिलचस्पी ले। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पिछले साल भी इगास पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया था, जिसका प्रभाव यह हुआ कि शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग बड़ी संख्या में अपने गांव पहुंचे। वीरान गांव भी इगास पर गुलजार देखे गए। इस बार यह पर्व 4 नवम्बर को मनाया जाएगा। इस दिन प्रदेशभर में राजकीय अवकाश की जानकारी स्वयं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने फेसबुक अकाउण्ड के जरिए गढ़वाली भाषा में पोस्ट करके दी। इगास पर राजकीय अवकाश घोषित होते ही सीएम धामी का यह फैसला सोशल मीडिया पर छा गया। अब धामी चाहते हैं कि इगास के दिन अधिक से अधिक लोग (जिनके लिए संभव है) अपने पैतृक गांव पहुंचें और पूरे रीति रिवाज के साथ इस लोक पर्व को मनाएं। खासकर नई पीढ़ी इगास के उत्सव में शामिल होकर लोकपर्वों के प्रति अपनी दिलचस्पी का इजहार करे। सुखद बात यह है कि युवा वर्ग इगास मनाने को लेकर उत्सुक नजर आ भी रहा है। इगास पर सार्वजनिक अवकाश से लोक पर्वों को जन सहभागिता से पूरे उत्साह के साथ मनाने की मुहिम सी चल पड़ी है। मुख्यमंत्री धामी स्वयं भी लोक पर्वों को उत्साह के साथ मनाते आए हैं। इस दौरान वह पूरा ध्यान रखते हैं कि घरेलू उत्पादों को बढ़ावा दिया जाए। हाल ही में खटीमा में उन्होंने काफिला रोककर रास्ते में खुद मिट्टी के दिए व अन्य उत्पाद खरीदकर ‘वोकल फॉर लोकल’ का संदेश दिया। लोक संस्कृति को बढ़ावा देने के प्रति उनकी इन कोशिशों को आम लोगों से काफी सराहना मिल रही है।

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