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युवा रचनाकार डॉ. नवनीत सिंह के कविता संग्रह ‘पानी के अभिलेख ‘का हुआ लोकार्पण

दून पुस्तकालय में नवनीत सिंह के कविता संग्रह ‘पानी के अभिलेख ‘का लोकार्पण

दून पुस्तकालय एवं शोध शोध केंद्र की ओर से आज युवा रचनाकार डॉ. नवनीत सिंह के कविता संग्रह ‘पानी के अभिलेख ‘का लोकार्पण केन्द्र के सभागार में हुआ.लोकापर्ण के पश्चात एक बातचीत भी हुई. इसमें वरिष्ठ कवि राजेश सकलानी और लोकेश नवानी ने भाग लिया.

वक्ताओं का कहना था कि जैसा कि काव्य संग्रह का मुख्य शीर्षक “पानी के अभिलेख” है इसमें सृष्टि के प्रमुख तत्व पानी के विभिन्न रूप व अर्थ प्रमुख रुप से उद्घाटित हुए हैं।रचनाकार नवनीत ने कविताओं के माध्यम से एक तरह से सामाजिक,सांस्कृतिक तथा पर्यावरण चेतना जागृत करने का प्रयास किया है. वक्ताओं ने यह भी कहा कि अपनी रचनाओं में कवि ने अपनी कविताओं प्रकृति और जीवन के संदर्भ में कई रहस्यवादी और दार्शनिक अर्थ भी रखे गए हैं। चांदी का झरना , पर्वत की चादर, संध्या झूला झूलती आदि कविताएं इस श्रेणी में आती हैं। मुख्य रुप से इनमें पर्वतीय समाज ,पर्वतों की विविध प्राकृतिक परिस्थितियां तथा वस्तुओं तथा पर्वत क्षेत्र में रहने वाले लोगों की जीवन शैली को भी अनायास प्रकट हुई दीखती है।कार्यक्रम से पूर्व कई युवा कवियों ने इस काव्य संग्रह की कुछ कविताओं का वाचन भी किया.

 

कुल मिलाकर नवनीत की कविताओं में पानी के ये विविध रूप में संसार के अस्तित्व को रेखांकित करते हुए नदी, झरनों तथा कभी दो तटों के बीच बहने वाले एक द्रव्य पदार्थ के रूप में तो कभी अभिलेख के रूप तो कभी हमारे अस्तित्व के आदि से वर्तमान तक की निरंतर यात्रा में एक ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्रोत जैसे महसूस होते हैं। इस नजरिये से यह कविताएं महत्वपूर्ण मानी जानी चाहिए. इन सामाजिक कविताओं में वर्तमान समाज के जटिल होते संबंधों, प्रकृति और समाज के बीच की दूरियों और समाज के वर्तमान ढांचे के सापेक्ष उसके भविष्य की संभावनाएं सायास प्रकट हुई हैं।

कविता संग्रह के रचनाकार नववीत सिंह ने कहा इन कविताओं के माध्यम से मैनें यह बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार आज ऐसी सभ्यता बन रही है जो कि समाज में दोहरे मापदंडों को स्वीकार कर चल रही है।यदि सांस्कृतिक कविताओं की बात की जाय तो भारतीय समाजों में निहित परंपराओं में मानवीय मूल्यों एवं ईश्वर के प्रति उनकी सकारात्मक आस्था को प्रकट करने का यत्न किया गया है। संकलन में आये ‘दिए का धीमे-धीमे जलना’ कविता के संदर्भ में कहा दिया जिस तरह किसी घर में प्रकाश करता है, लोग अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे कामों से, अपने . विचारों से दुनिया को प्रकाशित करते हैं। पर्यावरणीय चेतना के संबंध में वर्तमान दौर के पर्यावरण संकट, उस पर पड़ रहे विभिन्न राजनीतिक दबाव एवं उसके प्रति सामाजिक अज्ञानता को उन्होंने प्रदर्शित करने का प्रयास किया है। ‘नदी का हक’ कविता में कुछ इसी तरह की बात आयी है कि सामान्यतः एक नदी अपने मूल रूप को कभी भी नहीं छोड़ पाती है।

 

सामाजिक कार्यकर्ता व वरिष्ठ कवि लोकेश नवानी ने युवा कवि नवनीत की कविता यात्रा पर बात करते हुए कहा किदुनिया की सबसे खूबसूरत यात्रा कविता यात्रा होती है। लगभग हर व्यक्ति के जीवन में सबसे पहले कविता ही यात्रा करती है। वह इस यात्रा पर दुनिया को देखने निकल पड़ता है। वह दुनिया को कविता के चश्मे से देखता है।कविता मनुष्य की सोच व एक दर्शन है। दर्शन जो दिखाई दे रहा है उससे आगे जाकर देखना और महसूस करना। सही मायने में हम जीवन को कैसा महसूस करते हैं और जो देख रहे हैं उसके भीतर, पीछे, गहराई में क्या देख रहे हैं? उस बिम्ब को, विचार के शिल्प में बांधना ही कविता है।

 

वरिष्ठ समालोचक व कवि राजेश सकलानी ने कहा कि नवनीत ने जीवन का साक्षात्कार अपने तरीके से किया है। उन्हें आश्यर्य होता है कि युवा होते भी उनकी कविताओं में परिपक्वता तथा गहनता का भाव मिलता है।संवेदनातक भावनाओं को जीवन में उन्होंने कविताओं में उतारकर बुना है। उनकी हर कविता को पढ़कर एक नये दर्शन की अनुभूति होती है। नवनीत की कविताएं बताती हैं कि कवि के भीतर एक दार्शनिक रहता है। नवनीत का . यह पहला कविता संग्रह उम्मीद जगाता है कि वे भविष्य में नई वैचारिक या रचनात्मक दिशाओं का संधान करते हुए रचनात्मक जगत् में अपनी खास जगह बनाएंगे। उन्होंने नवनीत को सभावना शील कवि बताया.

 

कार्यक्रम का सफल संचालन मोहित नेगी ने किया. प्रारम्भ में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने वक्ता अतिथियों और सभागार में उपस्थित लोगों का अभिनंदन किया. युवा कवि नवनीत के इस काव्य संग्रह को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्हें बधाई दी. इस दौरान दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के पुस्तकालयाध्यक्ष, डॉ.डी. के. पाण्डे,संग्रहालय सलाहकार डॉ. लालता प्रसाद, शोध सहायक सुंदर सिंह बिष्टऔर जन कवि डॉ. अतुल शर्मा,अरविन्द शेखर, कांता डंगवाल घिल्डियाल, गजेन्द्र नौटियाल, जगदीश सिंह महर, मेघा, जगदम्बा मैठाणी, मधन सिंह बिष्ट, राकेश कुमार, नवीन नौटियाल, रानू बिष्ट, डॉ. वी. के. डोभाल, प्रेम पंचोली, के.बी. नैथानी, देवेन्द्र काण्डपाल, आशीष सुन्द्रियाल, सहित अनेक साहित्यकार, साहित्य प्रेमी, शहर के अन्य लोग, युवा पाठक आदि उपस्थित रहे।

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