मेरी रेडियो यात्रा
जयप्रकाश पंवार ‘जेपी’
पहली बार मेरे पिताजी ने दादा जी को 1970 के आस-पास एक इम्पीरियल कंपनी का बौक्स रेडियो गिफ्ट किया था. यह एक लाइसेंस वाला रेडियो था, जिसकी फीस पोस्ट ऑफिस में भरनी पढ़ती थी, इसकी मुझे आज भी याद है, बाद – में जब थोड़ा बड़ा हुआ तो में ही रेडियो की फीस भरता था. यह सब लिखने का मतलब है कि, मेरी पैदाइस के साथ ही मेरा रेडियो से जुड़ाव हो चुका था. रेडियो दादा जी सांय को लगभग 6 बजे से रात के अधिकतम 10 बजे तक सुनते थे तो जाहिर हैं, मैं भी सुनता था। 
आकाशवाणी का नजीबाबाद, लखनऊ केंद्र, विविध भारती दादाजी ज्यादा सुनते थे। गढ़वाली व कुमांउनी गीत, गीतकारों में कपूतरी देवी, जीत सिंह नेगी के गीत “तू होलि बीरा डांडियों मां घसियारी का भेष मां, केशव अनुरागी का गीत “ रिद्दी को सुमिरो सिद्धि को सुमिरो”, गोपाल बाबू गोस्वामी का “हाई तेरो रूमाला, गुलाबी मुखड़ी”, चन्द्र सिंह राही “सौली घुर घुर दगडया”, नरेन्द्र सिंह नेगी का “सरा ररा प्वां प्वां, चली भै मोटर चली”, रामरतन काला का गीत “ब्योली खुजे द्या”, बीना तिवारी का “अलीली बाखरी लिली” हीरा सिंह राणा का “अजकाल हरे ज्वाना”, विजय शैलानी, माधुरी बडथ्वाल, रेखा धस्माना उनियाल, जैसे अनेक गीतकारों के गीतों से पहाड़ की महिलाओं के जीवन संघर्ष, मनोस्थिति, प्रेम, बियोग, पहाड़ के इतिहास, संस्कृति, तीज त्योहारों, घटनाओं की समझ विकसित की।
तब से लेकर कृषि कार्यक्रम के तहत रागिनी से पहली बार परिचय हुआ. संगीत के अखिल भारतीय कार्यक्रमों में अलग – अलग भाषा बोली के गीत- संगीत, बाध्य यंत्रों, नृत्य संगीत, हवा महल के नाटक, फरमाइस कार्यक्रम, समाचार बुलेटिन, समाचार रिपोर्ट, साक्षात्कार, समीक्षाएं. उस दौर के नजीबाबाद रेडियो स्टेशन के प्रस्तुतकर्ताओं में प्रेम सडाना, माधुरी बडथ्वाल, राजन गुप्ता, अनिल भारती, कंडवाल जी, विनय ध्यानी, गमाल दा, रामरतन काला याद आते हैं. समाचारों के वाचकों में देवकी नंदन पांडे, अज़ीज हसन, उर्मिल थपलियाल जैसे नाम आज भी मन में है।
यहाँ जरुर उल्लेखित करना चाहूँगा कि, रेडियो भले दादा जी का था व उनकी दैनिक दिनचर्या का मत्वपूर्ण हिस्सा था, लेकिन उसका श्रोता वर्ग बहुत बड़ा था. पांच दादाओं का 20 कमरों वाला बड़ा घर व उतना ही बड़ा चौक था, मेरे दादाजी के हिस्से बीच वाला घर था, यानि सांय को दादाजी चौक में दर्री बिछाकर व मोटा गद्दा व तकिया लगाकर मुंडेर पर पीठ टिकाये, सांय की चाय व हुक्का गुड़गुडाकर जैसे ही रडियो खोलते तो तो सन्नाटा सा हो जाता व सभी टक लगाये रेडियो सुनने लग जाते, सारे दादा – दादियाँ, ताऊ – चाचा, ताई – चाचियाँ, भाई – बहिनें, बच्चे कुल मिलकर लगभग 50 श्रोता एक साथ रेडियो सुनते, मनोरंजन करते, व देश दुनियां का ज्ञान प्राप्त करते. अनपढ़ों (खासकर महिलाओं) के लिए यह एक स्कूल का काम करता।
रेडियो मोटे सेल से चलता था कुल चार सेल लगते थे, दादाजी बैकअप के तौर पर 4 अतिरिक्त सेल रखते व पुराने सेलों को चूल्हे के किनारे गर्म कर दुबारा कुछ वक़्त के लिए काम आ जाते थे, टोर्च के सेलों का भी दुबारा इस्तेमाल किया जाता था. रेडियो में ए.एम. मीडियम वेब व शार्ट वेब से अलग – अलग स्टेशन जैसे रेडियो सिलोन, बी.बी.सी., लखनऊ, दिल्ली, नजीबाबाद आदि के कार्यक्रम सुने जा सकते थे. बिनाका व बाद में सिबाका गीतमाला व उसके प्रस्तुतकर्ता आमीन सायानी, सुबह के समय भजन व आल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस से फरमाइस गीत युवाओं में बहुत लोक प्रिय थे, गणतंत्र परेड व क्रिकेट की कमेंटरी सुनने का वह दौर आज भी मनो मस्तिस्क में ताजा है. जसदेव सिंह की आवाज आज भी मन में गूंज रही है।
कुल मिलाकर रेडियो मेरे जैसे गांव के बच्चे के लिए भी यह एक अलग तरह की स्कूल थी. यह एक शिक्षा व मनोरंजन का कम्पलीट पैकेज था, जिसने देश व दुनिया को समझने की खिड़की प्रदान की. जैसे – जैसे बड़े होते गये रेडियो जीवन का एक हिस्सा बनता चले गया. उस वक़्त मन में एक ही विचार और सपना आता था कि, क्या में भी कभी रेडियो पर अपनी आवाज में कुछ प्रस्तुत कर पाऊंगा?
लगभग सन 1993 – 94 के आस-पास रेडियो से जुड़ाव शुरू हुआ, नजीबाबाद केंद्र से वार्ताओं, कविताओं, कहानियों का प्रसारण करने के छुटपुट मौके मिलते रहे. तब रिकॉर्डिंग टेप में होती थी।
मेरा विश्वविद्यालय का अध्ययन पूरा हो चुका था, पत्रकारिता करने के साथ पत्रकारिता अध्यन के लिए भी ऐडमिसन ले लिया व सामजिक क्षेत्र में कुछ रोजगार करने लगा. उन्हीं दिनों पौड़ी में आकाशवाणी का नया स्टूडियो खुला व केजुअल उदघोषक के लिए आवेदन आमंत्रित किये गए, आवेदन भरा व परीक्षा के लिए पौड़ी पहुंचा. चूँकि में तब श्रीनगर में रहता था, तो पास होने के बावजूद, स्थानीय की शर्त पर चयन नहीं हो पाया. मेरी स्वर परीक्षा व प्रस्तुति का के तरीके की सभी ने सराहना की थी।
मैंने भी मन लगाकर तैयारी की थी, शब्दों का सही उच्चारण, सांसों को सही वक़्त पर छोड़ना, स्वरों का सही उतार – चढ़ाव, विशेष शब्दों या घटनाओं को उचित फोकस देना, बोलने की स्पीड को सही रखना, वाक्यों के बीच के समय का प्रबंधन आदि प्रयोग करता रहा. भले ही चयन नहीं हुआ पर इसका फायदा ये हुआ कि नजीबाबाद केंद्र से बीच – बीच में वार्ता, कविता, कहानी के लिए हर साल एक या दो बार बुलावा आता रहा।
सन 2000 के आस-पास मैंने फिल्म, टेलीविजन, रेडियो, प्रकाशन आदि कार्य के लिये “चैनल माउंटेन” संस्थान की शुरुआत की व हर तरह के प्रोडक्शन का काम शुरू किया. जिसमें रेडियो प्रोडक्शन एक महत्वपूर्ण कार्य था. पहली रेडियो सीरीज 13 एपिसोड की पंचायत राज विषय को लेकर बनाई, दूसरी सिरीज 13 एपिसोड की पंचायतों में महिलाओं की भागेदारी को लेकर बनायी, तीसरी सीरीज 13 एपिसोड की महिला समाख्या परियोजना को लेकर बनायी, जिसका विषय महिलाओं के अधिकारों पर आधारित था, फिर अगला रेडियो कार्यक्रम 13 एपिसोड का “रेडियो मुमकिन है” भी महिलाओं के अधिकारों का समर्पित था. इसी तरह स्वामी राम हॉस्पिटल ट्रस्ट के लिए 13 एपिसोड का एच.आई. वी. एड्स कार्यक्रम भी महिलाओं की जन जागरूकता बढ़ाने वाला कार्यक्रम था।
इसके अतिरिक्त जब आकाशवाणी का देहरादून केंद्र नहीं खुला था तब नजीबाबाद केंद्र की पत्रिका कार्यक्रम के लिए स्वतंत्र रूप से रिपोर्ट भी फ़ोन से भेजता था. ये सारे रेडियो कार्यक्रम आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद से समय समय पर प्रसारित किये गये थे. सन 2007 में अंतरराष्ट्रीय फोर्ड फ़ेलोशिप के तहत अध्यन के लिए ऑस्ट्रेलिया गया तो वहां कैनबरा कम्युनिटी रेडियो व यूनिवर्सिटी रेडियो से भी जुड़ा रहा व रूस की सरकारी प्रसारण एजेंसी रिओनोवोस्टी से भी रेडियो प्रसारण का प्रशिक्षण लेने का मौका मिला व ये सारे अनुभव अपने राज्य की सेवा करने का एक अच्छा आधार बना।
मजे की बात यह है कि उन दिनों साउंड रिकॉर्डिंग सॉफ्टवेयर बड़े महगें थे व साउंड रिकॉर्डिंग स्टूडियोज भी नहीं थे. इसको चुनौती के रूप में लिया।हमारे पास डीवी कैसेट कैमरा हुआ करता था, बूम माइक में हम कैसेट में साउंड, म्यूजिक रिकॉर्ड करते व वीडियो एडिटिंग सॉफ्टवेयर में ऑडियो की एडिटिंग कर सीडी में प्रोग्राम कॉपी कर नजीबाबाद केंद्र को भेजते थे, जहाँ से प्रायोजित कार्यक्रम प्रसारित होते थे. इस तरह रेडियो कार्यक्रम को रुचिकर बनाने के लिए जिंगल, स्लोगन, सुचना, नाटक, झलकियाँ आदि का लेखन से लेकर, प्रस्तुतिकरण व संपादन कार्यों को करते हुए रेडियो कार्यक्रमों के निर्माण की समझ विकसित की।
सन 2000 में उत्तराखंड राज्य बनने के एक दसक बाद आकाशवाणी का देहरादून केंद्र खुला तो रेडियो से जुड़ने का अवसर मिला, आकस्मिक उदघोषक का आवेदन निकला तो ग्रामजगत कार्यक्रम से 2018 से जुड़ा व बचपन का संजोया सपना पूरा हुआ व लगातार बर्तमान तक रेडियो की यह यात्रा जारी है। रेडियो से जुड़ने से अपने वरिष्ठ अधिकारीयों, प्रसारण कर्मियों से उनके अनुभवों से अपना कौशल विकसित करने का काम हर दिन करता रहता हूँ। हर दिन जब भी मौका मिलता है रेडियो जरुर सुनता हूँ, ग्रामजगत कार्यक्रम में महिलाओं के विषयों पर लगातार चर्चा – परिचर्चा, वार्ताओं, कविताओं, कहानियों, गीतों को शामिल कर एक बैलेंस प्रोग्राम तैयार करते हैं, गढ़वाली, जौनसारी, कुमांउनी बोली भाषाओँ का यह एक मात्र लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम जो स्थानीय बोली भाषाओँ के संरक्षण व प्रसार में बड़ा योगदान दे रहा है।
इसके अतिरिक्त महिला जगत, जनानों का वास्ता, गढ़वाली – कुमांउनी बोली – भाषा में प्रादेशिक समाचारों का बुलेटिन एक बड़ी उपलब्धि है. यहाँ यह उल्लेख करना रुचिकर होगा कि आकाशवाणी के देहरादून केंद्र में आकस्मिक उदघोषकों में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले ज्यादा है, अकेले ग्राम जगत कार्यक्रम के 20 आकस्मिक उदघोषकों में 13 उदघोषक महिलायें हैं जो गर्व की बात है। पिछले एक वर्ष से संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों को समर्पित 24 एपिसोड का पाक्षिक “रेडियो हिमालय” कार्यक्रम का लेखन, निर्देशन, प्रतुतिकरण व प्रसारण आकाशवाणी के देहरादून केंद्र से किया, जिसमें हर एपिसोड में महिलाओं के अधिकारों, रोजगार, शिक्षण, प्रशिक्षण, कौशल विकास, व्यक्तित्व विकास, स्वास्थ्य, भोजन, आवास, कृषि, जलवायु परिवर्तन, उद्यम, तकनीकी जैसे अनेक विषयों को शामिल किया गया था।


